*# दलाली से मान्यता तक: प्रदीप-सिराज के 'वसूली सिंडिकेट' का महाखुलासा!*
*# एलडीए में खलबली: राजमुख्यालय की मान्यता की आड़ में महा-उगाही का भंडाफोड़!*

## सनसनीखेज महाखुलासा: राजमुख्यालय की मान्यता की आड़ में उगाही का बड़ा सिंडिकेट! एलडीए से लेकर घंटाघर तक प्रदीप और सिराज का आतंक
**लखनऊ।** राजधानी लखनऊ में पत्रकारिता के पवित्र चोले को ओढ़कर ब्लैकमेलिंग और अवैध उगाही का एक ऐसा घिनौना साम्राज्य चल रहा है, जिसने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को शर्मसार कर दिया है। कभी एलडीए (लखनऊ विकास प्राधिकरण) के गलियारों में कौड़ियों के लिए दलाली करने वाला और चाय की दुकान पर जूठे कप धोने वाला **प्रदीप उपाध्याय** आज राजमुख्यालय का मान्यता प्राप्त पत्रकार बनकर शहर के बिल्डरों और अधिकारियों के लिए मुसीबत बन चुका है। इस काले धंधे में उसका बराबर का हिस्सेदार है उसका जोड़ीदार **सिराज**।
इन दोनों ने मिलकर लखनऊ में समानांतर ‘वसूली सरकार’ खड़ी कर दी है, जिसके आगे एलडीए के बड़े-बड़े साहब भी भीगी बिल्ली बने नजर आते हैं।
### ‘परफेक्ट मीडिया’ का परफेक्ट फर्जीवाड़ा: ४ महीने में रसूख का खेल
नियमों को ठेंगे पर रखकर मान्यता हासिल करने का जो खेल प्रदीप उपाध्याय ने खेला है, वह बेहद शातिराना है। सरकारी नियमानुसार, किसी भी मीडिया संस्था के कम से कम एक साल पुराने होने और उसकी क्रेडिबिलिटी जांचने के बाद ही मान्यता दी या रिन्यू की जाती है।
लेकिन प्रदीप उपाध्याय ने नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए **’परफेक्ट मीडिया’** नाम की एक फर्जी संस्था खड़ी की दो वरिष्ठ पत्रकारों’ के रसूख और संरक्षण का इस्तेमाल कर इस कागजी संस्था को महज़ **४ महीने के भीतर** राजमुख्यालय की मान्यता दिला दी गई। अब इसी सरकारी मान्यता कार्ड को असलहे की तरह चमकाकर एलडीए और पूरे लखनऊ में ब्लैकमेलिंग का धंधा धड़ल्ले से चल रहा है।
### मानवता भी शर्मसार: मेडिकल कॉलेज के सामने शव वाहनों से वसूली!
इस सिंडिकेट की संवेदनहीनता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्रदीप उपाध्याय का पुराना इतिहास सिर्फ एलडीए की दलाली तक सीमित नहीं रहा है। सूत्रों के मुताबिक, इसने मेडिकल क्षेत्र में भी हाथ आजमाया था। लेकिन वहां मरीजों का भला करने के बजाय, इस गिरोह ने मेडिकल कॉलेज के सामने खड़े होने वाले **शव वाहनों (लाश ढोने वाली गाड़ियों) को अपनी वसूली का जरिया बना लिया**। जो गिरोह मजबूरी और दुख के वक्त भी पैसे ऐंठ सकता है, उसके लिए बिल्डरों और अधिकारियों को ब्लैकमेल करना तो बाएं हाथ का खेल है।
### अधिकारियों के साथ सीक्रेट वीडियो रील और याहियागंज का नेक्सस
प्रदीप उपाध्याय का रूतबा एलडीए दफ्तरों में किसी ‘विशेषाधिकार प्राप्त निदेशक’ जैसा रहता है। जोनल अधिकारी से लेकर जूनियर इंजीनियर और सुपरवाइजर तक, इसके सामने नतमस्तक रहते हैं। इसके काम करने का तरीका बेहद संगठित है:
* **सीक्रेट वीडियो रील:** यह अधिकारियों के साथ पहले बैठकर गोपनीय और मधुर संबंध बनाता है, और फिर आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कर चुपके से उनकी **वीडियो रील** तैयार कर लेता है।
* **IGRS बना वसूली का हथियार:** वीडियो लीक करने और मुख्यमंत्री पोर्टल (IGRS) पर शिकायत दर्ज करने की धमकी देकर यह साहबों को घुटनों पर ला देता है।
* **याहियागंज का खेल:** पुराने शहर और याहियागंज के एक नामी बिल्डर के साथ प्रदीप की जोड़ी ‘जय-वीरू’ जैसी है। बिल्डर अवैध निर्माण करता है, और प्रदीप अपनी कथित पत्रकारिता की ढाल से उसे कानूनी सुरक्षा देता है।
### शाम को ऐतिहासिक घंटाघर पर सजती है ‘उगाही की महफिल’
दिनभर की थकाऊ दलाली और ब्लैकमेलिंग के बाद, शाम ढलते ही नवाबों के ऐतिहासिक **घंटाघर** पर एक बदरंग महफिल सजती है। यह कोई अदबी या शेरो-शायरी का जमावड़ा नहीं होता। यहाँ प्रदीप उपाध्याय, सिराज, उनकी कथित ‘यूट्यूबर फौज’ और एलडीए के भ्रष्ट सुपरवाइजरों का **’गेट-टुगेदर’** होता है।
> इस महफिल में दिनभर की उगाही के रुपयों का हिसाब-किताब होता है, हिस्सेदारी बांटी जाती है और अगले दिन किस वैध-अवैध निर्माण पर आईजीआरएस का बम फोड़कर बिल्डर को डराना है, उसकी रणनीति तैयार होती है।
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### सीसीटीवी फुटेज खुलेगी, तो उतरेंगे बड़े-बड़े मुखौटे!
मुख्यमंत्री जी का सख्त आदेश है कि सूबा पूरी तरह से भ्रष्टाचार मुक्त होना चाहिए, लेकिन इन दलालों ने मुख्यमंत्री के अपने ड्रीम प्रोजेक्ट ‘IGRS पोर्टल’ को ही ब्लैकमेलिंग का टूल बना लिया है। खुद भ्रष्टाचार के दलदल में गले तक डूबे ये भाईसाहब दूसरों पर कीचड़ उछालकर अपनी दलाली की दुकान चमका रहे हैं।
अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है। शासन और प्रशासन को चाहिए कि:
1. एलडीए दफ्तर के **सीसीटीवी कैमरों की फुटेज** निकाली जाए, ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके कि कौन सा दलाल किस अधिकारी की गाड़ी में घूम रहा था।
2. सूचना विभाग तत्काल प्रभाव से **’परफेक्ट मीडिया’** की फर्जी मान्यता को रद्द करे।
3. शव वाहनों से लेकर बिल्डरों तक को चूना लगाने वाले प्रदीप उपाध्याय, सिराज और इन्हें संरक्षण देने वाले दोनों ‘वरिष्ठ पत्रकारों’ के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई हो।
जब तक इन मुखौटों के पीछे के असली चेहरे बेनकाब नहीं होंगे, तब तक लखनऊ का विकास सिर्फ इन दलालों की तिजोरियों में ही होता रहेगा।
