*राजधानी लखनऊ में कामता चौराहे पर 'ट्रैफिक पुलिस' का डाका: कागज़ पूरे, फिर भी 'चढ़ावा' दो... वरना डिजिटल चालान तय*
*हस्ताक्षर बिना चालान रद्द हो!' — कामता तिराहे पर खुली वसूली से सहमे बस चालकों की सरकार को सीधी ललकार*
*खाकी का ‘डिजिटल डाका’: कामता तिराहा बना अवैध वसूली का नया अड्डा, ‘चालान’ के खौफ से थमी चालकों की सांसें!*
*अखबार की विस्फोटक एक्सक्लूसिव रिपोर्ट: ‘सारे कागज़ सही, फिर भी दो हफ्ता’… लखनऊ में ट्रैफिक पुलिस के संगठित सिंडिकेट का पर्दाफाश*
विशेष संवाददाता | लखनऊ
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ, जहाँ से पूरे प्रदेश की कानून-व्यवस्था को साधने के दावे किए जाते हैं, वहीं की सड़कों से एक ऐसा सच सामने आ रहा है जो शासन-प्रशासन की साख की धज्जियां उड़ाने के लिए काफी है। कामता चौराहे और अयोध्या-गोरखपुर हाईवे को जोड़ने वाले प्रमुख तिराहे पर इन दिनों चेकिंग के नाम पर ‘खुलेआम वसूली का खेल’ खेला जा रहा है।
सड़कों से लेकर सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्मों तक वायरल हो रही तस्वीरें, ऑडियो और वीडियो क्लिप्स यह साफ बयां कर रही हैं कि कैसे राजधानी की ट्रैफिक पुलिस आम चालकों और खासकर बस ऑपरेटरों के लिए आतंक का दूसरा नाम बन चुकी है। सबसे बड़ा सवाल तो महकमे के आलाधिकारियों पर उठ रहा है। डीसीपी ट्रैफिक रवीना त्यागी की नाक के नीचे चल रहे इस खेल पर प्रशासनिक चुप्पी यह सोचने पर मजबूर कर रही है कि क्या इस ‘हफ्ता सिंडिकेट’ की जड़ें ऊपर तक फैली हुई हैं?
📸 *पीछे से फोटो, सामने से वसूली’: ट्रैफिक पुलिस का ‘हाईटेक’ खेल*
कामता चौराहे से गुजरने वाले कमर्शियल वाहनों, अंतर्राज्यीय निजी बसों और लोकल ट्रांसपोर्टरों का आरोप है कि चेकिंग का मकसद अब यातायात व्यवस्था को दुरुस्त करना नहीं, बल्कि ‘दैनिक टारगेट’ पूरा करना रह गया है। चालकों ने इस पूरे नेक्सस की जो कार्यप्रणाली बताई है, वह चौंकाने वाली है:
* छिपे हुए कैमरों से वार: कामता चौराहे के हर मोड़ और कट पर खाकी वर्दी में जवान या उनके प्राइवेट गुर्गे मोबाइल और कैमरों के साथ तैनात रहते हैं। बिना वाहन को रोके या बिना किसी प्रत्यक्ष उल्लंघन के, पीछे से चुपके से गाड़ियों की फोटो खींच ली जाती है।
* ‘सुविधा शुल्क’ बनाम ‘ताबड़तोड़ चालान’: यदि वाहन चालक मौके पर जाकर तथाकथित ‘एंट्री फीस’ या ‘चढ़ावा’ दे देता है, तो उसकी फोटो डिलीट कर दी जाती है। लेकिन यदि किसी चालक ने अपने कागजात सही होने का तर्क दिया या पैसे देने से इनकार किया, तो कुछ ही मिनटों में उसके मोबाइल पर भारी-भरकम चालान का ई-मैसेज लैंड कर जाता है।
* एक ही दिन में बहुकोणीय चालान: चालकों का दर्द यह है कि अगर वे एक जगह ‘चढ़ावा’ नहीं देते, तो अगले मोड़ पर खड़ी दूसरी टीम को अलर्ट कर दिया जाता है। नतीजा यह होता है कि एक ही बस का एक ही दिन में तीन से चार अलग-अलग लोकेशनों पर चालान काट दिया जाता है।
> “गाड़ी के सारे कागजात, फिटनेस, इंश्योरेंस और परमिट दुरुस्त हैं। फिर भी कामता पार करने के लिए जेब ढीली करनी पड़ती है। मना करो तो ऐसा चालान ठोक देते हैं कि दिन भर की कमाई तो दूर, घर से पैसा भरना पड़ता है।”
> — एक पीड़ित अंतर्राज्यीय बस चालक
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💰 *तबादला: बदलते ही बदल जाते हैं तौर-तरीके, नहीं बदलती वसूली!*
राजधानी में आम जनमानस और ट्रांसपोर्टरों के बीच अब यह चर्चा आम हो चुकी है कि ट्रैफिक पुलिस में आने वाले छोटे-बड़े अधिकारी चाहें कोई भी हों, इस ‘वसूली तंत्र’ पर लगाम लगाने में पूरी तरह नाकाम साबित हुए हैं।
समय-समय पर स्थानीय समाचार पत्रों में कामता, मटियारी, पॉलीटेक्निक और दुबग्गा जैसे चौराहों पर चल रही अवैध वसूली की खबरें प्रमुखता से प्रकाशित होती हैं। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियोज में सिपाही और होमगार्ड चालकों से पैसे लेते रंगे हाथों पकड़े जाते हैं। लेकिन हर बार प्रशासनिक स्तर पर केवल ‘जांच का आश्वासन’ या छोटे कर्मचारियों पर नाममात्र की खानापूरी वाली कार्रवाई करके फाइलें बंद कर दी जाती हैं।
सवाल यह उठता है कि क्या डीसीपी ट्रैफिक रवीना त्यागी और कमिश्नरेट के उच्चाधिकारी इस ज़मीनी हक़ीक़त से अनजान हैं? या फिर मौन रहकर इस वसूली को परोक्ष शह दी जा रही है? यदि आलाधिकारियों का खौफ होता, तो चौराहे पर खुलेआम लेन-देन का यह दुस्साहस देखने को न मिलता।
💥 *बस ऑपरेटरों का ‘विस्फोटक’ प्रस्ताव: “बिना हस्ताक्षर के चालान रद्द माना जाए*
ट्रैफिक पुलिस के इस ‘डिजिटल डाके’ से आजिज़ आ चुके वाहन चालकों और बस एसोसिएशनों ने सरकार और शासन से एक सीधा और बड़ा सवाल किया है: “आखिर यह रिश्वतखोरी कब बंद होगी?”
लगातार हो रहे आर्थिक शोषण से बचने के लिए बस चालकों ने सरकार के समक्ष एक ठोस कानून बनाने की पुरजोर मांग उठाई है:
📜 *पारदर्शिता का नया फॉर्मूला*
* चालक के हस्ताक्षर अनिवार्य हों: सरकार कानून में ऐसा संशोधन करे कि सड़क पर काटे गए किसी भी ई-चालान या मैन्युअल चालान की वैधता तभी मानी जाए, जब उस पर मौके पर मौजूद वाहन चालक के हस्ताक्षर हों।
* पीछे से फोटो खींचकर चालान काटने पर रोक: जब तक वाहन को मौके पर रोककर चालक को उसकी गलती न बताई जाए और सत्यापन न हो, तब तक दूर से खींची गई फोटो के आधार पर चालान प्रक्रिया को अमान्य घोषित किया जाए।
* फर्जीवाड़े पर तुरंत फुलस्टॉप: चालकों का तर्क है कि हस्ताक्षर अनिवार्य होते ही ट्रैफिक कर्मियों द्वारा पीछे से फोटो खींचकर घर बैठे ई-चालान भेजने के फर्जीवाड़े और उगाही के डर पर 90% तक अंकुश लग जाएगा।
❓*ज़ीरो टॉलरेंस’ का दावा करने वाली सरकार से जनता के 5 सीधे सवाल?*
* क्या कामता तिराहा लखनऊ कमिश्नरेट की सीमा से बाहर है, जो अधिकारियों को वहां का भ्रष्टाचार दिखाई नहीं देता?
* बार-बार अखबारों में छपने और वीडियो वायरल होने के बाद भी ठोस नीतिगत कार्रवाई क्यों नहीं होती?
* क्या डीसीपी ट्रैफिक केवल बैठकों तक सीमित हैं या कभी कामता चौराहे पर भेष बदलकर औचक निरीक्षण करेंगी?
* कागजात पूरे होने के बावजूद चालकों से ‘बंद करने’ और ‘चालान काटने’ के नाम पर वसूली करने वाले गिरोह पर गैंगस्टर एक्ट के तहत कार्रवाई कब होगी?
* क्या मुख्यमंत्री के ‘जीरो टॉलरेंस’ के विज़न को राजधानी की ही खाकी वर्दी पानी फेरने में जुटी है?
निष्कर्ष: अब बयानों से नहीं, चाबुक से बनेगा काम!
कावता चौराहे की ये तस्वीरें सिर्फ एक चौराहे की कहानी नहीं हैं, बल्कि यह उस प्रशासनिक तंत्र की पोल खोलती हैं जहाँ ‘रक्षक ही भक्षक’ की भूमिका में नजर आ रहे हैं। जब तक जिम्मेदार उच्चाधिकारी अपनी एसी गाड़ियों से उतरकर ज़मीन पर निष्पक्ष कार्रवाई नहीं करेंगे और उगाही में शामिल अधिकारियों-कर्मचारियों पर कड़ा एक्शन नहीं लेंगे, तब तक ‘सुशासन’ का दावा केवल कागजों तक ही सीमित रहेगा।
जनता और ट्रांसपोर्टरों की आँखें अब सरकार की तरफ टिकी हैं—क्या इस हफ्ता वसूली नेटवर्क पर बाबा का बुलडोज़र या प्रशासनिक चाबुक चलेगा, या फिर कामता चौराहे पर खाकी का यह ‘डिजिटल डाका’ यूं ही बदस्तूर जारी रहेगा?
