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घूसखोर पंडत सीरीज पर भड़के पूर्व सपा विधायक ओमप्रकाश दूबे"बाबा"

क्या ओटीटी प्लेटफॉर्म बन चुका है भाषाई आतंकवाद का अड्डा- पूर्व विधायक


*महा-विस्फोट: “अभिव्यक्ति की आज़ादी या सांस्कृतिक डकैती?-ओमप्रकाश दूबे”बाबा”*

*घूसखोर पंडत’ जैसे प्रयोगों पर भड़का आक्रोश; क्या ओटीटी (OTT) बन चुका है भाषाई आतंकवाद का अड्डा?*

नई दिल्ली: सिनेमा और वेब सीरीज के नाम पर ‘सृजनात्मकता’ का नकाब ओढ़कर जो परोसा जा रहा है, उसने अब मर्यादा की सारी हदें पार कर दी हैं। “घूसखोर पंडत” जैसे शब्द केवल टाइटल नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा के सीने पर किया गया एक गहरा प्रहार हैं। इसे ‘भाषाई छल’ कहें या ‘बौद्धिक षड्यंत्र’, लेकिन अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है।

*ज्ञान का अपमान: “पंडत” को कीचड़ में घसीटने की साजिश?*

इतिहास गवाह है कि ‘पंडत’ शब्द उस विभूति के लिए उपयोग होता है जिसने अपनी मेधा से समाज को दिशा दी। लेकिन आज के ‘डिजिटल युग’ के स्वयंभू रचनाकारों ने इस शब्द को ‘घूसखोरी’ जैसे कलंक के साथ नत्थी कर दिया है।
* तर्क सीधा है: क्या आप ‘पवित्र’ को ‘अपवित्र’ से जोड़कर केवल मनोरंजन कर रहे हैं? या फिर जानबूझकर एक पूरी व्यवस्था और सम्मानसूचक उपाधि को अपमानित करने का एजेंडा चला रहे हैं?
विशेषज्ञों का कहना है कि यह “भाषाई लिंचिंग” है, जहाँ शब्दों के अर्थों की हत्या सरेआम की जा रही है।

*अब आर-पार की जंग: ‘कोड ऑफ कंडक्ट’ नहीं तो कंटेंट नहीं!*

समाजवादी पार्टी के पूर्व विधायक व प्रमुख समाजसेवी ओमप्रकाश दूबे”बाबा” व देशभर के बुद्धिजीवियों और समाजसेवियों ने अब एक स्वर में आवाज़ उठाई है। मांग अब केवल विरोध की नहीं, बल्कि “सर्जिकल स्ट्राइक” जैसी कार्रवाई की है:

* भाषाई सेंसरशिप अनिवार्य हो: सेंसर बोर्ड की तर्ज पर एक ‘लिंग्विस्टिक वॉचडॉग’ बने जो यह तय करे कि शब्दों के साथ छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

* हर्जाना और जेल: जो निर्माता किसी समुदाय की गरिमा या सम्मानसूचक शब्दों को नकारात्मक विशेषणों से दूषित करे, उन पर करोड़ों का जुर्माना और आपराधिक मुकदमा चलना चाहिए।

* ब्लैकलिस्ट हों ऐसे निर्माता: स्वतंत्रता के नाम पर अराजकता फैलाने वाले प्रोडक्शन हाउसेस को सीधे प्रतिबंधित करने की मांग तेज़ हो गई है।

*नीति बनेगी, तभी संस्कृति बचेगी!*

बिना लगाम के दौड़ता ओटीटी का यह घोड़ा अब समाज की जड़ों को खोखला कर रहा है। यदि आज ‘घूसखोर पंडत’ जैसे शब्दों को ‘क्रिएटिव लिबर्टी’ मान लिया गया, तो कल भाषा का कोई भी शब्द सुरक्षित नहीं रहेगा। यह केवल एक फिल्म का विरोध नहीं है, यह भारतीयता की रक्षा का सवाल है।

*कड़ा संदेश:*”स्वतंत्रता का अर्थ नग्नता या गाली-गलौज नहीं है। यदि कंटेंट निर्माता खुद को अनुशासित नहीं कर सकते, तो सरकार को लोहे के जूतों से इस अराजकता को कुचलना होगा।”

NAV BHARAT DARPAN

कृष्णानन्द शर्मा "शिवराम" 2007 से पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्यरत हैं, दैनिक जागरण,अमर उजाला, युनाइटेड भारत, स्वतंत्र भारत, सन्मार्ग जैसे हिन्दी दैनिक समाचार पत्रों में अपनी लेखनी के जरिए उत्पीड़न, भ्रष्टाचार, समसामयिक मुद्दों पर प्रकाश डालते रहे, वर्तमान में नवभारत दर्पण न्यूज नेटवर्क में प्रधान सम्पादक पद पर कार्यरत हैं, फिल्म सिटी नोएडा से नवभारत दर्पण न्यूज नेटवर्क का संचालन करते हैं, जिसमें हिन्दी दैनिक समाचार पत्र, न्यूज पोर्टल, वेबसाइट,व यूट्यूब न्यूज चैनल व अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अपनी सेवाएं प्रदान कर रहें हैं।

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