*ब्लैकमेलिंग सिंडिकेट का भंडाफोड़: सरकारी विज्ञापन ऐंठने के लिए आईएएस अफसरों पर टूलकिट हमला!*
*पत्रकारिता के नाम पर गुंडागर्दी: सूचना निदेशक को निशाना बना रहे यूट्यूबरों के गैंग का पर्दाफाश!*


*सूचना निदेशक को ब्लैकमेल करने की साजिश: यूट्यूबरों के तथाकथित गैंग का पर्दाफाश*
*विज्ञापन हथियाने के लिए आईएएस अफसरों को बना रहे निशाना*
लखनऊ।पत्रकारिता के नाम पर डिजिटल स्पेस में पनप रहे कुछ ‘तथाकथित’ पत्रकारों और यूट्यूबरों का खतरनाक गठजोड़ अब प्रशासनिक व्यवस्था पर हावी होने की कोशिश कर रहा है। बिना किसी स्थापित मानक, पंजीकरण और नैतिक मूल्यों के संचालित हो रहे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का एक गैंग एकजुट होकर वरिष्ठ और कर्तव्यनिष्ठ आईएएस अधिकारियों पर धौंस जमा रहा है। मामला सूचना निदेशक विशाल सिंह और शासन के अन्य ईमानदार अधिकारियों से जुड़ा है, जहाँ तथ्यहीन आरोपों का सहारा लेकर सरकारी विज्ञापन हथियाने का सुनियोजित जाल बिछाया गया है।
*अनैतिक दबाव और ब्लैकमेलिंग का खेल*
सूत्रों और हालिया घटनाक्रमों के अनुसार, अभिषेक उपाध्याय और अमित मौर्या जैसे तथाकथित पत्रकारों का एक समूह इस ब्लैकमेलिंग सिंडिकेट को हवा दे रहा है। बिना किसी ठोस साक्ष्य और प्रामाणिकता के प्रशासनिक अधिकारियों पर अनर्गल आरोप मढ़ना और फिर विज्ञापन पाने के लिए दबाव बनाना इस गैंग का मुख्य हथकंडा बन चुका है। निष्पक्ष पत्रकारिता की आड़ में चलाया जा रहा यह खेल वास्तव में विशुद्ध रूप से आर्थिक और व्यक्तिगत स्वार्थों की पूर्ति का माध्यम बनकर रह गया है।
*टूलकिट पत्रकारिता और प्रायोजित एजेंडा*
विभागीय गलियारों और राजनीतिक विश्लेषकों में इस बात की भी तीव्र चर्चा है कि यह पूरा नेटवर्क एक राजनीतिक ‘टूलकिट’ का हिस्सा बनकर काम कर रहा है। समाजवादी पार्टी (सपा) के टूलकिट के तहत काम कर रहे इन तथाकथित पत्रकारों का मकसद केवल विज्ञापन प्राप्त करना ही नहीं, बल्कि जनहित और निष्ठा से काम कर रहे अधिकारियों की छवि धूमिल कर प्रशासनिक स्थिरता को चोट पहुँचाना है।
*कड़ी जाँच और मानकों की सख्त आवश्यकता*
इस प्रकार की बेलगाम गतिविधियों को देखते हुए अब यह अत्यंत आवश्यक हो गया है कि ऐसे संस्थानों और व्यक्तियों की गहनता से जाँच कराई जाए:
* वित्तीय एवं बैंक रिकॉर्ड: इन चैनलों और पत्रकारों के बैंक खातों की जाँच हो ताकि यह स्पष्ट हो सके कि इनके पीछे कौन सी संदिग्ध फंडिंग काम कर रही है।
* कॉल डिटेल व फोन रिकॉर्ड: ब्लैकमेलिंग के इस गठजोड़ में शामिल मुख्य किरदारों और उनके आकाओं के आपसी संपर्कों का पर्दाफाश करने के लिए फोन रिकॉर्ड खंगाले जाएँ।
* संस्थानों का पंजीकरण व मानक: प्रेस काउंसिल और सूचना विभाग के तय मानकों के आधार पर इन यूट्यूब चैनलों व वेब पोर्टल्स की वैधता तय की जाए।
*पत्रकारिता का आचार शास्त्र: ‘स्वतंत्रता’ और ‘स्वछंदता’ का फर्क*
*क्या कोई पत्रकार किसी व्यक्ति के चरित्र पर बेबुनियाद तरीके से उंगली उठा सकता है?*
उत्तर: कदापि नहीं। भारतीय प्रेस परिषद (PCI) के आचार संहिता मानकों के अनुसार, किसी भी व्यक्ति या अधिकारी की प्रतिष्ठा और चरित्र पर बिना किसी प्रामाणिक साक्ष्य के आरोप लगाना गंभीर कानूनी और नैतिक अपराध है। निष्पक्षता और सत्यापन पत्रकारिता के प्रथम स्तंभ हैं।
*क्या यह गैंग पत्रकारिता के मानकों को पूरा करता है?*
उत्तर: बिल्कुल नहीं। पत्रकारिता किसी को डराने, धमकाने या विज्ञापन ऐंठने का लाइसेंस नहीं देती। बिना मानक संचालित हो रहे ये डिजिटल माध्यम प्रेस की आचार संहिता का खुला उल्लंघन कर रहे हैं।
पत्रकार निश्चित रूप से स्वतंत्र है और उसे सवाल पूछने का संवैधानिक अधिकार है, लेकिन यह स्वतंत्रता ‘स्वछंदता’ या ‘अराजकता’ में नहीं बदल सकती। अभिव्यक्ति की आजादी की अपनी मर्यादाएँ हैं। जब पत्रकारिता का उद्देश्य जनहित के बजाय व्यक्तिगत लाभ और चरित्र हत्या बन जाए, तो कानून के तहत सख्त दंडात्मक कार्रवाई और वित्तीय-प्रशासनिक जाँच ही एकमात्र विकल्प बचता है।
