**सुप्रीम कोर्ट में 'शपथ', हाई कोर्ट में 'मुकदमा': घिरे अधिवक्ता कामरान, बार काउंसिल और गृह विभाग तक पहुंची शिकायत!**
**अदालत से 'तथ्य छिपाकर' राहत लेने का गंभीर आरोप; सूचना विभाग को मुकदमों में घसीटने वाले वकील खुद विधिक चक्रव्यूह में फंसे!**






# *सर्वोच्च न्यायालय में ‘नो जर्नलिज्म’ का हलफनामा, उच्च न्यायालय में मान्यता की जंग: घिरे अधिवक्ता डॉ. मोहम्मद कामरान*
### **अदालत से ‘तथ्य छिपाकर’ राहत लेने का गंभीर आरोप; सूचना विभाग को मुकदमों में घसीटने वाले वकील के खिलाफ बार काउंसिल और गृह विभाग तक पहुंची शिकायत**
**लखनऊ।**माननीय उच्च न्यायालय से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक की विधिक प्रक्रियाओं को कथित रूप से गुमराह करने और सूचना एवं जनसंपर्क विभाग, उत्तर प्रदेश को आधा दर्जन से अधिक मुकदमों में उलझाने वाले अधिवक्ता डॉ. मोहम्मद कमरान अब खुद कानूनी और अनुशासनात्मक कार्रवाई के चक्रव्यूह में घिरते नजर आ रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष ‘पत्रकारिता न करने’ का लिखित आश्वासन (Undertaking) देने के बावजूद, उच्च न्यायालय में तथ्य छिपाकर पत्रकार मान्यता (Accreditation) के नवीनीकरण के लिए रिट याचिका दाखिल करने का एक बेहद सनसनीखेज मामला सामने आया है।
इस गंभीर ‘न्यायिक धोखाधड़ी’ (Fraud Upon the Court) को लेकर रजिस्ट्रार (उच्च न्यायालय), महाधिवक्ता, उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव, सूचना विभाग के प्रमुख सचिव व निदेशक समेत बार काउंसिल ऑफ इंडिया तक एक विस्तृत और कड़ा शिकायती पत्र भेजा गया है, जिसमें दोषी अधिवक्ता के खिलाफ आपराधिक व अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग की गई है।
### **क्या है पूरा मामला? सर्वोच्च न्यायालय में दिया था वचन**
शिकायत में दिए गए दस्तावेजी साक्ष्यों के अनुसार, डॉ. मोहम्मद कमरान माननीय सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष दायर **एस.एल.पी. (क्रिमिनल) संख्या 9615/2024** में खुद याचिकाकर्ता थे। उस दौरान बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) ने साफ रुख अपनाया था कि कोई भी पंजीकृत अधिवक्ता पूर्णकालिक पत्रकारिता नहीं कर सकता।
घिरते देख, डॉ. कामरान ने **13 दिसंबर 2024** को सुप्रीम कोर्ट में एक शपथपत्र (Affidavit) दाखिल कर बकायदा **आश्वासन (Undertaking) दिया था कि वे भविष्य में पूर्णकालिक या अंशकालिक किसी भी रूप में पत्रकारिता नहीं करेंगे** और केवल वकालत की प्रैक्टिस करेंगे। सर्वोच्च न्यायालय ने **16 दिसंबर 2024** के अपने आदेश में इस वचन को रिकॉर्ड पर लेते हुए मामले को अंतिम रूप से निस्तारित कर दिया था।
### **सुप्रीम कोर्ट में ‘शपथ’, हाई कोर्ट में ‘मुकदमा’: सूचना विभाग को बनाया निशाना**
विस्फोटक तथ्य यह है कि सर्वोच्च न्यायालय को दिए वचन को ठेंगा दिखाते हुए उक्त अधिवक्ता ने सूचना एवं जनसंपर्क विभाग को दबाव में लेने के लिए आधा दर्जन से अधिक मुकदमे किए। इसी क्रम में माननीय उच्च न्यायालय, लखनऊ खंडपीठ के समक्ष **रिट-सी संख्या 3189/2026** दायर कर दी।
इस रिट याचिका में विभाग पर अनर्गल आरोप लगाते हुए पत्रकार मान्यता के नवीनीकरण की मांग की गई और दावा किया गया कि वे 25 वर्षों से स्वतंत्र पत्रकार हैं। हैरान करने वाली बात यह है कि इस नई याचिका में सुप्रीम कोर्ट के उस ऐतिहासिक आदेश और अपने ही शपथपत्र (कि वे पत्रकारिता छोड़ रहे हैं) का कोई जिक्र नहीं किया गया।
> **”महत्वपूर्ण तथ्यों को जानबूझकर छिपाना (Suppression of Material Facts) न्याय प्रशासन पर सीधा आघात है। साफ हाथों (Clean Hands) से न्यायालय न आकर, माननीय उच्च न्यायालय को गुमराह करने का यह प्रयास सीधे तौर पर न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है।”**
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### **भारतीय न्याय संहिता (BNS) की संगीन धाराओं में कार्रवाई की मांग**
शिकायतकर्ता ने सूचना विभाग के न्यायसंगत पक्ष को मजबूती से रखते हुए मांग की है कि इस पूरे आचरण के लिए डॉ. कामरान के खिलाफ कड़ी विधिक कार्रवाई की जाए। शिकायत में स्पष्ट किया गया है कि यह कृत्य निम्नलिखित धाराओं के तहत दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है:
* **BNS, 2023 की धारा 227 व 228:** न्यायालय के समक्ष झूठे साक्ष्य प्रस्तुत करना या गढ़ना।
* **BNS, 2023 की धारा 217 व 318:** सरकारी विभागों को गुमराह करने के लिए झूठी सूचना देना और छलपूर्वक न्यायिक लाभ प्राप्त करना।
* **अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 35:** एक ‘ऑफिसर ऑफ द कोर्ट’ (अधिवक्ता) द्वारा ऐसा कृत्य घोर व्यावसायिक कदाचार (Professional Misconduct) है, जिसके तहत उनका लाइसेंस रद्द होना तय माना जा रहा है।
### **विभाग के पक्ष में मजबूत विधिक ढाल**
सूचना एवं जनसंपर्क विभाग अपर मुख्य सचिव श्री संजय प्रसाद,व निदेशक विशाल सिंह जी के देखरेख में पूरी तरह नियमों के तहत कार्य कर रहा है, जबकि संबंधित व्यक्ति द्वारा विभाग को अदालती मुकदमों में उलझाकर अनुचित लाभ लेने का प्रयास किया जा रहा था। अब इस शिकायत के बाद, उच्च न्यायालय के रिकॉर्ड की संमीक्षा की जा रही है। यदि तथ्य छिपाने की पुष्टि होती है, तो भ्रामक आधार पर प्राप्त किसी भी आदेश को निरस्त (Vacate) कराने के साथ-साथ उत्तर प्रदेश बार काउंसिल और बार काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा अधिवक्ता के खिलाफ बड़ी अनुशासनात्मक गाज गिरना तय है।
न्यायिक गलियारों में इस मामले को लेकर भारी सरगर्मी है, क्योंकि यह मामला केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि देश की सर्वोच्च अदालत के आदेशों की अवमानना और संवैधानिक न्यायालयों की शुचिता से जुड़ा है।
