**एक वोट के 'महाबली' का महा-इस्तीफा: अपमान या कामरान गैंग की ब्लैकमेलिंग का शिकार?**
**फर्जी लेटर पैड कांड के 'दागी' का इस्तीफा: संवाददाता समिति में भितरघात का अंत, गैंग की शरण में पहुंचे नेताजी!**

# **एक वोट के ‘महाबली’ का महा-इस्तीफा: अपमान या कामरान गैंग की ब्लैकमेलिंग का शिकार?**
**लखनऊ।** उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति (पुनर्गठित) के भीतर चल रहा सियासी भितरघात आखिरकार पटाक्षेप की ओर बढ़ गया है, लेकिन अपने पीछे कई ऐसे सुलगते सवाल छोड़ गया है जिसने पत्रकारिता जगत की शुचिता पर बहस छेड़ दी है। विगत दिनों संपन्न हुए चुनाव में बर्खास्त अध्यक्ष शेखर पंडित के स्थान पर नया मुखिया चुना जाना था। चुनावी अखाड़े में के.के. सिंह कृष्णा, दिग्गज पत्रकार विक्रम राव और वरिष्ठ पत्रकार जितेन्द्र सिंह जी ने ताल ठोकी थी। दावा तो बड़ा था, लेकिन जब मतपेटियां खुलीं तो ‘अपनों’ के दावों की हवा निकल गई।
### **सिर्फ एक वोट… वो भी खुद का!**
चुनावी नतीजों ने कइयों को अचंभे में डाल दिया। खुद को बेहद कद्दावर समझने वाले के.के. सिंह कृष्णा को इस महा-मुकाबले में सिर्फ और सिर्फ **एक मत** प्राप्त हुआ—और राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि यह इकलौता वोट भी खुद उन्होंने ही अपने सम्मान में डाला था! वहीं दूसरे प्रत्याशी श्री जितेन्द्र सिंह जी को 5 वोट सम्मानजनक स्थिति में मिले जितेन्द्र सिंह व अमन अग्रवाल समिति के लिए सदैव तत्पर हैं तथा तीसरे प्रत्याशी विक्रम राव 11 मतों के साथ एकतरफा बाजी मारते हुए अध्यक्ष पद का ताज अपने नाम कर लिया।
दिलचस्प बात यह है कि के.के. सिंह कृष्णा को समिति के संयोजक प्रभात कुमार त्रिपाठी का बेहद करीबी माना जाता था। हार के बाद जब श्री सिंह की भावनाएं ‘आहत’ हुईं, तो संयोजक प्रभात कुमार त्रिपाठी ने बड़े भाई की भूमिका निभाते हुए उन्हें बहुत समझाया, ढांढस बंधाया और आश्वस्त किया कि संगठन में उनके मान-सम्मान में रत्ती भर भी कमी नहीं आने दी जाएगी। उपाध्यक्ष पद पर रहते हुए संगठन उनका पूरा आदर कर रहा था, लेकिन सिर्फ एक वोट पाने वाले नेताजी को यह सम्मान शायद हजम नहीं हुआ।
### **कामरान गैंग की शरण में ‘दागी’ चेहरा?**
अब सवाल यह उठता है कि आखिर अचानक ऐसा क्या हुआ जो श्री सिंह आधी रात को पलटी मार गए? सूत्रों की मानें तो यह आत्मसम्मान की लड़ाई नहीं, बल्कि परदे के पीछे चल रही **ब्लैकमेलिंग के कुचक्र** का नतीजा है।
विगत दिनों तेजतर्रार पत्रकार अभिषेक उपाध्याय ने के.के. सिंह कृष्णा के कारनामों का एक बड़ा भंडाफोड़ किया था। उस सनसनीखेज स्टोरी में साफ दिखाया गया था कि कैसे श्री सिंह ने सत्ताधारी भाजपा की एक विंग के फर्जी लेटर पैड का इस्तेमाल कर शासन में एक ट्रांसफर (स्थानांतरण) की पैरवी कर डाली थी। इस फर्जीवाड़े की गिरफ्त में आकर शासन का एक रसूखदार अधिकारी भी गुमराह हो गया था, जिससे सीधे तौर पर सरकार की छवि धूमिल हुई थी।
सूत्रों का दावा है कि इस पूरे फर्जी लेटर पैड कांड का मास्टरमाइंड कोई और नहीं, बल्कि समिति विरोधी **’कामरान गैंग’** था। इसी ‘कमजोरी’ की नस दबाकर कामरान गैंग ने के.के. सिंह कृष्णा को ब्लैकमेल किया और संवाददाता समिति (पुनर्गठित) को तोड़ने का एक घिनौना कुचक्र रचा।
### **इस्तीफे से और साफ हुई समिति की छवि**
जब संगठन को तोड़ने की साजिशें नाकाम हो गईं, तो थक-हारकर के.के. सिंह कृष्णा ने समिति के उपाध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया और औपचारिक रूप से कामरान गैंग का दामन थाम लिया। हालांकि, उनका यह इस्तीफा संवाददाता समिति के लिए किसी ‘वरदान’ से कम साबित नहीं हो रहा है।
प्रबुद्ध पत्रकारों का कहना है कि इतने गंभीर आरोपों से घिरे व्यक्ति के जाने से उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति (पुनर्गठित) अब पूरी तरह से साफ-सुथरी और बेदाग हो गई है। अगर ऐसा कोई विवादित चेहरा संगठन के शीर्ष पदों पर बना रहता, तो पूरी समिति की साख पर सवालिया निशान खड़े होते। अच्छा ही हुआ कि ‘दागी’ चेहरा अब अपने असली और सही गिरोह में पहुंच गया है।
संयोजक प्रभात कुमार त्रिपाठी और नवनियुक्त अध्यक्ष विक्रम राव के नेतृत्व में अब यह समिति बिना किसी आंतरिक भितरघात के, पूरी पारदर्शिता और मजबूती के साथ पत्रकारों के हित में काम करने के लिए तैयार है। एक वोट के ‘सिकंदर’ का जाना संगठन की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी शुद्धि है!