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सुप्रीम कोर्ट ने नये यूजीसी नियमों पर लगाया रोक

शैक्षणिक संस्थानों में जातिगत विभाजन स्वीकार्य नहीं -चीफ जस्टिस सूर्यकांत


*सुप्रीम कोर्ट ने नए यूजीसी नियमों पर लगाई रोक*

*शैक्षणिक संस्थानों में जातिगत विभाजन स्वीकार्य नहीं*

*कृष्णानन्द शर्मा*

नई दिल्ली: देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता और समावेशिता को लेकर एक ऐतिहासिक टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों पर रोक लगा दी है। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने केंद्र सरकार और UGC को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि शिक्षण संस्थानों का वातावरण ऐसा होना चाहिए जहाँ भारत की विविधता और एकता की झलक मिले, न कि विभाजन की।

*जातिविहीन समाज की ओर बढ़ें, पीछे नहीं: CJI*

सुनवाई के दौरान पीठ ने तीखी टिप्पणी करते हुए पूछा कि क्या देश सामाजिक सुधारों के मामले में उल्टी दिशा में कदम बढ़ा रहा है? कोर्ट ने कहा है कि हमने दशकों के संघर्ष के बाद जातिविहीन समाज की दिशा में जो कुछ भी हासिल किया है, क्या हम अब उसे खोने जा रहे हैं? शिक्षण संस्थानों में जातियों के आधार पर अलगाव पैदा करना प्रगतिशील समाज की पहचान नहीं है।

“SC/ST छात्रों के लिए अलग हॉस्टल पर आपत्ति
अदालत ने विशेष रूप से SC/ST छात्रों के लिए अलग हॉस्टल बनाने के प्रस्ताव पर आपत्ति जताई। CJI सूर्यकांत ने केंद्र को संबोधित करते हुए कहा कि आरक्षित समुदायों के भीतर भी एक संपन्न वर्ग (Creamy Layer) उभरा है, जो अन्य की तुलना में बेहतर सुविधाओं का लाभ ले रहा है। ऐसे में केवल जाति के आधार पर अलग व्यवस्था करना समानता के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है।
नियमों की अस्पष्टता और दुरुपयोग का खतरा
कोर्ट ने UGC के नए नियमों की शब्दावली पर भी सवाल उठाए। पीठ के मुख्य बिंदु निम्नलिखित रहे:
* परिभाषा में अस्पष्टता: नियमों की वर्तमान परिभाषा पूरी तरह स्पष्ट नहीं है, जिससे भविष्य में इनके दुरुपयोग की प्रबल संभावना है।
* विशेषज्ञों की राय: कोर्ट ने सुझाव दिया कि इन नियमों को लागू करने से पहले विशेषज्ञों से परामर्श कर इनमें आवश्यक संशोधन किए जाने चाहिए।
* 3e बनाम 3c प्रणाली: कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब विश्वविद्यालयों में ‘3e प्रणाली’ (स्वतंत्र और समान वातावरण) को बढ़ावा दिया जा रहा है, तो ‘3c प्रणाली’ जैसी प्रतिगामी नीतियां प्रासंगिक कैसे हो सकती हैं? क्या यह वर्तमान ढांचे में पूरी तरह अनावश्यक नहीं हैं?

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विश्वविद्यालयों का लक्ष्य एक स्वतंत्र और समान वातावरण बनाना होना चाहिए जहाँ छात्र अपनी पहचान से ऊपर उठकर एक भारतीय के रूप में शिक्षा ग्रहण कर सकें। कोर्ट ने इस मामले में केंद्र और UGC से विस्तृत जवाब मांगा है और अगली सुनवाई तक नए नियमों के क्रियान्वयन पर पूर्ण रोक लगा दी है।

*कैंपस में दीवारें या पुल? UGC के नए नियमों और सामाजिक एकीकरण का विश्लेषण*

शिक्षा का मूल उद्देश्य केवल डिग्री प्रदान करना नहीं, बल्कि एक ऐसे नागरिक का निर्माण करना है जो संकीर्ण पहचानों से ऊपर उठकर सोच सके। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा UGC के नए नियमों पर लगाई गई रोक ने एक पुरानी लेकिन अनिवार्य बहस को फिर से जिंदा कर दिया है: क्या हमारे विश्वविद्यालय ‘लघु भारत’ (Mini India) बनेंगे या वे जातिगत खानों में बंटे हुए टापू?
1. अलगाव और मानसिक स्वास्थ्य: ‘मिरर इफेक्ट’
जब हम SC/ST या किसी विशेष वर्ग के छात्रों के लिए अलग हॉस्टल या ब्लॉक बनाते हैं, तो हम अनजाने में उनके मन में ‘दूसरेपन’ (Othering) की भावना पैदा करते हैं।
* आत्मविश्वास पर चोट: अलग रहने से आरक्षित वर्ग के छात्रों में यह भावना आ सकती है कि वे मुख्यधारा से अलग हैं।
* पूर्वाग्रहों को बढ़ावा: जब छात्र आपस में घुलते-मिलते नहीं हैं, तो एक-दूसरे के प्रति रूढ़िवादी धारणाएं (Stereotypes) मजबूत होती हैं। साझा रसोई, साझा खेल का मैदान और साझा कमरे ही वे जगहें हैं जहाँ जातिगत दूरियां मिटती हैं।
2. ‘क्रीमी लेयर’ और आंतरिक असमानता
जैसा कि माननीय उच्चतम न्यायालय ने टिप्पणी की, आरक्षित वर्गों के भीतर भी एक ऐसा वर्ग तैयार हुआ है जो आर्थिक और सामाजिक रूप से समृद्ध है।
* असमान लाभ: यदि नियम केवल जाति पर आधारित होते हैं, तो उसी समुदाय के वास्तव में पिछड़े छात्र उन सुविधाओं से वंचित रह जाते हैं, जिनका लाभ उस समुदाय के ‘सक्षम’ लोग उठा लेते हैं।
* विविधता बनाम अलगाव: विविधता का अर्थ ‘सबका साथ’ होना चाहिए, न कि ‘सबका अलग-अलग’ होना।
3. 3e प्रणाली: समानता का आधुनिक मंत्र
कोर्ट ने जिस 3e प्रणाली (Equity, Equality, Empowerment) की बात की, वह विश्वविद्यालयों के लिए एक मार्गदर्शक सिद्धांत होनी चाहिए।
* Equity (समता): उन छात्रों को विशेष सहायता देना जो पीछे रह गए हैं (जैसे एक्स्ट्रा कोचिंग या आर्थिक मदद)।
* Equality (समानता): लेकिन यह सहायता उन्हें मुख्यधारा से अलग करके नहीं, बल्कि उनके साथ रखकर दी जानी चाहिए।
* Empowerment (सशक्तीकरण): असली सशक्तीकरण तब होता है जब एक छात्र अपनी जाति की पहचान के बिना अपनी प्रतिभा के दम पर पहचाना जाए।
4. भविष्य की चुनौती: नीतिगत सुधार या सामाजिक बदलाव?
नियमों की अस्पष्टता अक्सर प्रशासन को ‘शक्ति’ दे देती है, जिसका दुरुपयोग छात्रों के उत्पीड़न के लिए हो सकता है। यदि नियम स्पष्ट नहीं हैं, तो वे सुरक्षा कवच बनने के बजाय भेदभाव का हथियार बन सकते हैं।

*निष्कर्ष:* भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में विश्वविद्यालय वे ‘प्रयोगशालाएं’ हैं जहाँ भविष्य का समाज तैयार होता है। यदि इन प्रयोगशालाओं में ही हम विभाजन की रेखाएं खींच देंगे, तो एक एकजुट राष्ट्र का सपना अधूरा रह जाएगा। सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप हमें याद दिलाता है कि प्रगति का रास्ता पीछे की ओर नहीं, बल्कि एक ऐसे समावेशी भविष्य की ओर होना चाहिए जहाँ ‘जाति’ नहीं, ‘योग्यता और सह-अस्तित्व’ सर्वोपरि हो। फिलहाल यूजीसी पर दखल देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दिया है जो स्वागत योग्य है।

NAV BHARAT DARPAN

कृष्णानन्द शर्मा "शिवराम" 2007 से पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्यरत हैं, दैनिक जागरण,अमर उजाला, युनाइटेड भारत, स्वतंत्र भारत, सन्मार्ग जैसे हिन्दी दैनिक समाचार पत्रों में अपनी लेखनी के जरिए उत्पीड़न, भ्रष्टाचार, समसामयिक मुद्दों पर प्रकाश डालते रहे, वर्तमान में नवभारत दर्पण न्यूज नेटवर्क में प्रधान सम्पादक पद पर कार्यरत हैं, फिल्म सिटी नोएडा से नवभारत दर्पण न्यूज नेटवर्क का संचालन करते हैं, जिसमें हिन्दी दैनिक समाचार पत्र, न्यूज पोर्टल, वेबसाइट,व यूट्यूब न्यूज चैनल व अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अपनी सेवाएं प्रदान कर रहें हैं।

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