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*विशेष संपादकीय: दोगलापन और राजनैतिक दलों का दोहरा चरित्र* *देश मजबूत हाथों में है" या "हिन्दू खतरे में है"? एक विस्फोटक विश्लेषण* *लेखक:कृष्णानन्द शर्मा* *(समूह सम्पादक, नवभारत दर्पण न्यूज नेटवर्क)* भारतीय राजनीति के वर्तमान परिदृश्य में एक ऐसा विरोधाभास जन्म ले चुका है, जो तर्क की कसौटी पर किसी 'अजूबे' से कम नहीं है। एक ही मंच से, एक ही विचारधारा द्वारा दो ऐसी बातें कही जाती हैं जो एक-दूसरे की धुर विरोधी हैं। जनता के सामने एक तरफ यह दावा पेश किया जाता है कि "देश अब मजबूत हाथों में है" और भारत विश्वगुरु बनने की राह पर है, वहीं दूसरी ओर उसी सांस में यह डरावना नैरेटिव सेट किया जाता है कि "हिन्दू खतरे में है।" सवाल उठता है कि यदि नेतृत्व इतना ही शक्तिशाली है कि दुनिया भारत का लोहा मान रही है, तो देश के भीतर 100 करोड़ की आबादी वाला बहुसंख्यक समाज आखिर 'खतरे' में कैसे हो सकता है? यह सवाल ही राजनैतिक दलों के उस 'दोगलेपन' की कलई खोल देता है जिसे 'वोट बैंक' की खाद से सींचा जाता है। *विरोधाभासों की राजनीति:* आत्मविश्वास बनाम भय राजनैतिक दल बड़ी चालाकी से जनता के मनोविज्ञान के साथ खेलते हैं। "मजबूत हाथों" का नारा उस मध्यम वर्ग के लिए है जो वैश्विक स्तर पर भारत का सम्मान बढ़ता देख गौरवान्वित महसूस करता है। यह राष्ट्रवाद का 'पॉजिटिव कार्ड' है। लेकिन, जैसे ही चुनाव की दहलीज आती है, यह गौरव अचानक 'अस्तित्व की लड़ाई' में बदल जाता है। अचानक गलियों-कूचों में यह चर्चा तेज कर दी जाती है कि अगर फलां दल सत्ता में नहीं रहा, तो आपकी संस्कृति और धर्म मिट जाएगा। * सवाल: अगर शासन 'लौह पुरुष' चला रहे हैं, तो प्रशासन इतना लाचार क्यों दिखाया जाता है कि धर्म खतरे में पड़ जाए? * सच्चाई: यह 'खतरा' वास्तविक नहीं, बल्कि चुनावी ध्रुवीकरण (Polarization) का सबसे सुरक्षित हथियार है। *मुद्दों की बलि चढ़ाता 'दोहरा चरित्र* जब देश के ज्वलंत मुद्दों—जैसे बेरोजगारी, कमरतोड़ महंगाई, और गिरती शिक्षा व्यवस्था—पर जनता सवाल पूछने लगती है, तब ये 'खतरे' ढाल बनकर सामने आते हैं। *राजनैतिक दलों का दोहरा चरित्र देखिए* * सत्ता पक्ष: उपलब्धि गिनाते समय 'न्यू इंडिया' की बात करेगा, लेकिन वोट मांगते समय '80 बनाम 20' के नैरेटिव पर उतर आएगा। * विपक्ष: वह भी कम नहीं है। वह एक तरफ 'धर्मनिरपेक्षता' का चोगा पहनता है, तो दूसरी तरफ चुनाव आते ही 'जनेऊधारी' बनकर मंदिरों की परिक्रमा करने लगता है। यह दोगलापन ही है कि दल संविधान की शपथ तो लेते हैं, लेकिन उनकी पूरी रणनीति 'डर के व्यापार' पर टिकी होती है। *हिन्दू खतरे में है'—हकीकत या सियासी शिगूफा?* ऐतिहासिक और सांख्यिकीय दृष्टि से देखें तो भारत का मूल ढांचा हमेशा से समावेशी और सुदृढ़ रहा है। हकीकत यह है कि हिन्दू या कोई भी अन्य धर्म खतरे में नहीं है, बल्कि राजनैतिक दलों की कुर्सी खतरे में होती है। जब विकास के आंकड़ों से पेट नहीं भरता, तो भावनाओं की चाशनी में 'खतरे' का जहर घोलकर परोसा जाता है। यह एक ऐसा मनोवैज्ञानिक घेरा है जिसमें उलझकर आम नागरिक अस्पताल, स्कूल और सड़क की बात भूलकर 'रक्षक' चुनने की दौड़ में शामिल हो जाता है। *संपादकीय निष्कर्ष: जागने का वक्त है* एक नागरिक के तौर पर हमें समझना होगा कि 'मजबूत हाथ' वह होते हैं जो समाज के अंतिम व्यक्ति को सुरक्षा और सम्मान की गारंटी दें, न कि वह जो समाज में असुरक्षा का भाव पैदा करके सत्ता की सीढ़ियां चढ़ें। राजनैतिक दलों का यह दोहरा चरित्र लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है। जिस दिन जनता "मजबूत हाथों" से उनके काम का हिसाब मांगेगी और "खतरे" के फर्जी नैरेटिव को नकार देगी, उसी दिन सही मायने में देश मजबूत होगा। नवभारत दर्पण न्यूज नेटवर्क का यह स्पष्ट मानना है कि राष्ट्र का गौरव नारों में नहीं, बल्कि नागरिकों के निर्भय होकर जीने में है। राजनीति को भावनाओं के अखाड़े से निकालकर हकीकत की जमीन पर लाना ही आज की सबसे बड़ी जरूरत है। *कृष्णानन्द शर्मा* *समूह सम्पादक नवभारत दर्पण न्यूज नेटवर्क*

राजनैतिक दलों पर सवालिया निशान: दोगलेपन की हदें पार करते राजनैतिक दल


*विशेष संपादकीय: दोगलापन और राजनैतिक दलों का दोहरा चरित्र*

*देश मजबूत हाथों में है” या “हिन्दू खतरे में है”? एक विस्फोटक विश्लेषण*

*लेखक:कृष्णानन्द शर्मा*
*(समूह सम्पादक, नवभारत दर्पण न्यूज नेटवर्क)*

भारतीय राजनीति के वर्तमान परिदृश्य में एक ऐसा विरोधाभास जन्म ले चुका है, जो तर्क की कसौटी पर किसी ‘अजूबे’ से कम नहीं है। एक ही मंच से, एक ही विचारधारा द्वारा दो ऐसी बातें कही जाती हैं जो एक-दूसरे की धुर विरोधी हैं। जनता के सामने एक तरफ यह दावा पेश किया जाता है कि “देश अब मजबूत हाथों में है” और भारत विश्वगुरु बनने की राह पर है, वहीं दूसरी ओर उसी सांस में यह डरावना नैरेटिव सेट किया जाता है कि “हिन्दू खतरे में है।”
सवाल उठता है कि यदि नेतृत्व इतना ही शक्तिशाली है कि दुनिया भारत का लोहा मान रही है, तो देश के भीतर 100 करोड़ की आबादी वाला बहुसंख्यक समाज आखिर ‘खतरे’ में कैसे हो सकता है? यह सवाल ही राजनैतिक दलों के उस ‘दोगलेपन’ की कलई खोल देता है जिसे ‘वोट बैंक’ की खाद से सींचा जाता है।

*विरोधाभासों की राजनीति:*

आत्मविश्वास बनाम भय
राजनैतिक दल बड़ी चालाकी से जनता के मनोविज्ञान के साथ खेलते हैं। “मजबूत हाथों” का नारा उस मध्यम वर्ग के लिए है जो वैश्विक स्तर पर भारत का सम्मान बढ़ता देख गौरवान्वित महसूस करता है। यह राष्ट्रवाद का ‘पॉजिटिव कार्ड’ है।
लेकिन, जैसे ही चुनाव की दहलीज आती है, यह गौरव अचानक ‘अस्तित्व की लड़ाई’ में बदल जाता है। अचानक गलियों-कूचों में यह चर्चा तेज कर दी जाती है कि अगर फलां दल सत्ता में नहीं रहा, तो आपकी संस्कृति और धर्म मिट जाएगा।

* सवाल: अगर शासन ‘लौह पुरुष’ चला रहे हैं, तो प्रशासन इतना लाचार क्यों दिखाया जाता है कि धर्म खतरे में पड़ जाए?

* सच्चाई: यह ‘खतरा’ वास्तविक नहीं, बल्कि चुनावी ध्रुवीकरण (Polarization) का सबसे सुरक्षित हथियार है।

*मुद्दों की बलि चढ़ाता ‘दोहरा चरित्र*

जब देश के ज्वलंत मुद्दों—जैसे बेरोजगारी, कमरतोड़ महंगाई, और गिरती शिक्षा व्यवस्था—पर जनता सवाल पूछने लगती है, तब ये ‘खतरे’ ढाल बनकर सामने आते हैं।

*राजनैतिक दलों का दोहरा चरित्र देखिए*

* सत्ता पक्ष: उपलब्धि गिनाते समय ‘न्यू इंडिया’ की बात करेगा, लेकिन वोट मांगते समय ’80 बनाम 20′ के नैरेटिव पर उतर आएगा।
* विपक्ष: वह भी कम नहीं है। वह एक तरफ ‘धर्मनिरपेक्षता’ का चोगा पहनता है, तो दूसरी तरफ चुनाव आते ही ‘जनेऊधारी’ बनकर मंदिरों की परिक्रमा करने लगता है।
यह दोगलापन ही है कि दल संविधान की शपथ तो लेते हैं, लेकिन उनकी पूरी रणनीति ‘डर के व्यापार’ पर टिकी होती है।

*हिन्दू खतरे में है’—हकीकत या सियासी शिगूफा?*

ऐतिहासिक और सांख्यिकीय दृष्टि से देखें तो भारत का मूल ढांचा हमेशा से समावेशी और सुदृढ़ रहा है। हकीकत यह है कि हिन्दू या कोई भी अन्य धर्म खतरे में नहीं है, बल्कि राजनैतिक दलों की कुर्सी खतरे में होती है।
जब विकास के आंकड़ों से पेट नहीं भरता, तो भावनाओं की चाशनी में ‘खतरे’ का जहर घोलकर परोसा जाता है। यह एक ऐसा मनोवैज्ञानिक घेरा है जिसमें उलझकर आम नागरिक अस्पताल, स्कूल और सड़क की बात भूलकर ‘रक्षक’ चुनने की दौड़ में शामिल हो जाता है।

*संपादकीय निष्कर्ष: जागने का वक्त है*

एक नागरिक के तौर पर हमें समझना होगा कि ‘मजबूत हाथ’ वह होते हैं जो समाज के अंतिम व्यक्ति को सुरक्षा और सम्मान की गारंटी दें, न कि वह जो समाज में असुरक्षा का भाव पैदा करके सत्ता की सीढ़ियां चढ़ें।
राजनैतिक दलों का यह दोहरा चरित्र लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है। जिस दिन जनता “मजबूत हाथों” से उनके काम का हिसाब मांगेगी और “खतरे” के फर्जी नैरेटिव को नकार देगी, उसी दिन सही मायने में देश मजबूत होगा।

नवभारत दर्पण न्यूज नेटवर्क का यह स्पष्ट मानना है कि राष्ट्र का गौरव नारों में नहीं, बल्कि नागरिकों के निर्भय होकर जीने में है। राजनीति को भावनाओं के अखाड़े से निकालकर हकीकत की जमीन पर लाना ही आज की सबसे बड़ी जरूरत है।

*कृष्णानन्द शर्मा*
*समूह सम्पादक नवभारत दर्पण न्यूज नेटवर्क*

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कृष्णानन्द शर्मा "शिवराम" 2007 से पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्यरत हैं, दैनिक जागरण,अमर उजाला, युनाइटेड भारत, स्वतंत्र भारत, सन्मार्ग जैसे हिन्दी दैनिक समाचार पत्रों में अपनी लेखनी के जरिए उत्पीड़न, भ्रष्टाचार, समसामयिक मुद्दों पर प्रकाश डालते रहे, वर्तमान में नवभारत दर्पण न्यूज नेटवर्क में प्रधान सम्पादक पद पर कार्यरत हैं, फिल्म सिटी नोएडा से नवभारत दर्पण न्यूज नेटवर्क का संचालन करते हैं, जिसमें हिन्दी दैनिक समाचार पत्र, न्यूज पोर्टल, वेबसाइट,व यूट्यूब न्यूज चैनल व अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अपनी सेवाएं प्रदान कर रहें हैं।

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