अमिताभ ठाकुर की सांसें अटकीं! * गुनाहों का हिसाब शुरू: जमानत मिली नहीं, रिमांड की बारी आई तो 'दिल' दे गया जवाब!
* 27 साल पुराना भ्रष्टाचार और 24 घंटे का हाई वोल्टेज ड्रामा: अमिताभ ठाकुर की सांसें अटकीं!*

*सिस्टम का ‘हंटर’ या सियासी ‘बलि’? जेल की कालकोठरी में ढह गया पूर्व IPS का रसूख!*
*अमिताभ ठाकुर: कल तक जो ‘सुल्तान’ थे, आज वो ‘साजिश’ के शिकार हैं या अपने ही कर्मों के कैदी?*
*बागी’ का अंत या नई जंग?*
लखनऊ: सत्ता की आंखों में आंखें डालकर बात करने का शौक जब जुनून बन जाए, तो उसका हश्र क्या होता है? पूर्व IPS अमिताभ ठाकुर की मौजूदा हालत इसका जीता-जागता सबूत है। मंगलवार की काली रात देवरिया जेल के प्रशासन के लिए ‘कयामत’ की रात साबित हुई, जब कल तक जेल मैनुअल की धज्जियां उड़ाने वाला एक पूर्व अधिकारी सीने पर हाथ रखकर जिंदगी की भीख मांगता नजर आया। आनंद-फानन में उन्हें गोरखपुर मेडिकल कॉलेज के स्ट्रेचर पर डाल दिया गया।
डर रिमांड का है या ‘गुनाहों’ के हिसाब का?
हैरानी की बात देखिए, जैसे ही कोर्ट ने जमानत की अर्जी को कूड़ेदान के हवाले किया और पुलिसिया रिमांड का शिकंजा कसना शुरू हुआ, वैसे ही अमिताभ ठाकुर का ‘लौह पुरुष’ वाला कलेजा जवाब दे गया। सवाल उठना लाजिमी है—क्या यह वाकई मेडिकल इमरजेंसी है या फिर पुलिसिया पूछताछ से बचने का कोई पुराना ‘खाकी’ पैंतरा? जब 1999 में पद की धौंस दिखाकर पत्नी के नाम प्लॉट की बंदरबांट हो रही थी, तब शायद कानून का यह खौफ दिल में नहीं था।
ढाई दशक पुरानी फाइल और ‘सिस्टम’ का वार
भ्रष्टाचार का यह ‘गड़ा मुर्दा’ आज ही क्यों उखड़ा? यह सवाल उन लोगों के लिए है जो इसे सियासी प्रतिशोध कह रहे हैं। लेकिन कानून की अपनी चाल है। अगर 27 साल पहले फर्जीवाड़े की नींव रखी गई थी, तो आज उसकी दीवारें गिरनी ही थीं। अमिताभ ठाकुर ने अपनी पूरी सर्विस में जिस व्यवस्था को चुनौती दी, आज वही व्यवस्था अपनी पूरी ‘क्रूरता’ के साथ उनके सामने खड़ी है।
अनशन का नाटक और अब अस्पताल की पनाह!
जेल में सीसीटीवी फुटेज के लिए अनशन करने वाले अमिताभ ठाकुर को अब शायद समझ आ रहा है कि जेल की सलाखें और अस्पताल का वार्ड, सत्ता से बगावत की दो अनिवार्य मंजिलें हैं। जो शख्स खुद को ‘अजेय’ समझता था, आज वह पुलिस के पहरे में एंबुलेंस के सायरन के बीच अपनी सुरक्षा ढूंढ रहा है।
आज का सुलगता सवाल:
क्या अमिताभ ठाकुर वाकई एक ‘भ्रष्ट’ व्यवस्था के शिकार बने हैं, या फिर उन्होंने खुद भ्रष्टाचार की चादर ओढ़कर उसे ‘क्रांति’ का नाम देने की कोशिश की? आज कोर्ट का रिमांड पर आने वाला फैसला तय करेगा कि यह ‘बागी’ अधिकारी सलाखों के पीछे रहेगा या अस्पताल के सफेद चादरों में अपनी अगली चाल चलेगा।