राजधानी लखनऊ में यातायात पुलिस का तांडव,वाहन स्वामियों में आक्रोश,
सभी कागजात ठीक होने के बावजूद पत्रकार शोएब मिर्जा के बस को किया सीज, आक्रोशित बस संचालकों ने जिम्मेदार धन उगाही करने वाले अधिकारियों के उपर विभागीय कार्यवाही की किया मांग





*लखनऊ यातायात पुलिस का ‘खेल’: कागज़ पूरे, फिर भी पत्रकार की बस सीज़*
*वसूली के आरोपों से विभाग में हड़कंप*
*कृष्णानन्द शर्मा*
लखनऊ। राजधानी की यातायात पुलिस इन दिनों अपने ‘खास’ कारनामों को लेकर चर्चा में है। ताजा मामला टीले वाली मस्जिद के पास का है, जहाँ बारात बुकिंग के लिए जा रही पत्रकार शोएब मिर्जा की निजी बस को पुलिस ने जबरन सीज़ कर दिया। हैरानी की बात यह है कि बस के सभी दस्तावेज़ वैध पाए जाने के बावजूद की गई इस कार्रवाई ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
*क्या है पूरा मामला?*
मिली जानकारी के अनुसार, पत्रकार शोएब मिर्जा की निजी बस एक बारात को उठाने के लिए जा रही थी। टीले वाली मस्जिद के पास यातायात पुलिस ने बस को रोका। उस वक्त बस में केवल दो यात्री सवार थे। बस मालिक का दावा है कि वाहन के बीमा, फिटनेस और परमिट सहित सभी कागज़ात पूरी तरह दुरुस्त थे। इसके बावजूद, मौके पर मौजूद यातायात पुलिस के अधिकारियों ने नियमों को ताक पर रखकर वाहन को सीज़ कर दिया।
*एसीपी पर ‘धन उगाही’ के गंभीर आरोप*
इस कार्रवाई के बाद बस संचालकों और पत्रकार जगत में भारी आक्रोश है। आरोप है कि यातायात विभाग के एसीपी (ACP) स्तर के अधिकारियों के संरक्षण में शहर में ‘धन उगाही’ का संगठित खेल चल रहा है। बस संचालकों का कहना है कि:
* नियमों का हवाला देकर सिर्फ उन वाहनों को निशाना बनाया जा रहा है जो “सुविधा शुल्क” देने में असमर्थ हैं।
* पत्रकार की बस को निशाना बनाना पुलिस की तानाशाही का प्रमाण है।
* राजधानी भर में निजी बस संचालकों का मानसिक और आर्थिक शोषण किया जा रहा है।
*पुलिस का पक्ष: ‘नियमित कार्रवाई’ या ‘अवैध वसूली’?*
जब इस मामले पर डीसीपी के पीआरओ से संपर्क किया गया, तो उन्होंने इसे रूटीन चेकिंग का हिस्सा बताया। पुलिस का तर्क है कि केवल अवैध वाहनों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है। हालांकि, सवाल यह उठता है कि अगर कागज़ात सही थे, तो बस को सीज़ क्यों किया गया? क्या ‘अवैध वाहन’ की परिभाषा अब पुलिस की मर्जी पर निर्भर करेगी?
यह पूरी तरह से उत्पीड़न का मामला है। जब वाहन के पास वैध परमिट और फिटनेस है, तो सीज़ करने का कोई कानूनी आधार नहीं बचता। यह कार्रवाई नहीं, बल्कि खुलेआम डराना-धमकाना है।” — स्थानीय बस संचालक
*जनता के मन में सुलगते सवाल*
इस घटना ने लखनऊ पुलिस की छवि पर गहरा दाग लगा दिया है।
अब देखना यह है कि:
* क्या आरोपी अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच बैठेगी?
* क्या पुलिस कमिश्नर इस मामले में हस्तक्षेप कर न्याय सुनिश्चित करेंगे?
* या फिर जनता इस ‘धन उगाही’ को सरकारी व्यवस्था का हिस्सा मानकर चुप बैठ जाए?
राजधानी के पत्रकारों ने चेतावनी दी है कि यदि इस मामले में निष्पक्ष जांच और दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं हुई, तो वे बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन करेंगे।
