प्रभारी निरीक्षक बदलापुर हाईकोर्ट में तलब, मामला फर्जी हिरासत और हत्याकांड में साजिशन आरोपी बनाने का
खाकी पर अपहरण जैसा आरोप, उच्च न्यायालय सख्त, बदलापुर कोतवाल को किया तलब,

*बदलापुर पुलिस की ‘गुंडागर्दी’ पर हाईकोर्ट का चाबुक: अवैध हिरासत और फर्जी फंसाने के खेल में थानाध्यक्ष तलब*
*आठ दिनों तक युवक को ‘गायब’ रखने का आरोप; स्वाधीन सिंह हत्याकांड में जबरन हत्यारोपी बनाने की साजिश*
*हाईकोर्ट ने तल्ख लहजे में कहा: ‘जवाब दें या 27 जनवरी को खुद हाजिर हों*
जौनपुर, जिले के बदलापुर थाने की पुलिस एक बार फिर गंभीर आरोपों के घेरे में है। स्वाधीन सिंह उर्फ छोटू हत्याकांड की आड़ में निर्दोषों को ‘बलि का बकरा’ बनाने और उन्हें अवैध रूप से कैद करने के मामले को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बेहद गंभीरता से लिया है। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने बदलापुर थानाध्यक्ष की कार्यप्रणाली पर कड़ा प्रहार करते हुए उन्हें व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में पेश होने की चेतावनी दी है।
*खाकी पर ‘अपहरण’ जैसा आरोप*
मामला बदलापुर के आलोक मिश्रा से जुड़ा है। आरोप है कि पुलिस ने आलोक को 30 दिसंबर 2025 की रात को उठा लिया और बिना किसी कागजी कार्यवाही या गिरफ्तारी दिखाए 7 जनवरी 2026 की रात तक कालकोठरी में कैद रखा। आठ दिनों तक चले इस ‘अघोषित टॉर्चर’ और अवैध हिरासत के खिलाफ जब परिजनों ने गुहार लगाई, तो पुलिस की चुप्पी ने संदेह को पुख्ता कर दिया। इसके बाद पीड़ित के चाचा शैलेश मिश्रा ने हाई कोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका दायर की।
*कोर्ट में अधिवक्ता की तीखी बहस*
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रमोद कुमार पाण्डेय ने कोर्ट के सामने पुलिसिया बर्बरता का कच्चा चिट्ठा खोल दिया। उन्होंने दलील दी कि किसी भी नागरिक को बिना कानूनी प्रक्रिया के 8 दिनों तक कैद रखना न केवल मानवाधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि यह सीधे तौर पर संविधान की गरिमा को चुनौती है। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस आलोक मिश्रा को जबरन हत्यारोपी बनाने के लिए दबाव बना रही थी।
*हाईकोर्ट का अल्टीमेटम: “बच नहीं पाएंगे जिम्मेदार*
अदालत ने सरकारी अधिवक्ता के उस अनुरोध को स्वीकार तो किया जिसमें जवाब दाखिल करने के लिए एक सप्ताह का समय मांगा गया था, लेकिन साथ ही एक ‘डेडलाइन’ भी तय कर दी। कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया है कि:
* 27 जनवरी 2026 तक विपक्षी संख्या 3 (थानाध्यक्ष) को अपना जवाबी हलफनामा (Counter Affidavit) हर हाल में दाखिल करना होगा।
* यदि जवाब संतोषजनक नहीं हुआ या समय पर दाखिल नहीं किया गया, तो थानाध्यक्ष को स्वयं कटघरे में खड़ा होना पड़ेगा।
*इलाके में चर्चा: न्याय की उम्मीद जगी*
बदलापुर क्षेत्र में इस आदेश के बाद से हड़कंप मचा हुआ है। आम जनता के बीच चर्चा है कि क्या पुलिस अब भी अपनी मनमानी जारी रखेगी या उच्च न्यायालय इस मामले में दोषी पुलिसकर्मियों पर दंडात्मक कार्रवाई करेगा। बंदी प्रत्यक्षीकरण जैसे शक्तिशाली कानूनी हथियार ने एक बार फिर साबित किया है कि खाकी की मनमानी कानून के ऊपर नहीं हो सकती।