चीफ जस्टिस सूर्यकांत शर्मा: अनसुनी दास्तां और ऐतिहासिक फैसले
हरियाणा के लाल का डिजिटल विजन


*ज़मीन से ‘आसमान’ तक-सीजीआई जस्टिस सूर्यकांत शर्मा की अनसुनी दास्तां और उनके ऐतिहासिक फैसले*
*कृष्णानन्द शर्मा*
नई दिल्ली: भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में 24 नवंबर 2025 का सूर्योदय एक नई इबारत लिख गया। जब हिसार के एक छोटे से गांव पेटवाड़ का बेटा, जस्टिस सूर्यकांत (शर्मा), देश के 53वें मुख्य न्यायाधीश की कुर्सी पर बैठा, तो यह केवल एक पदोन्नति नहीं, बल्कि उस ‘आम आदमी’ की जीत थी जिसने अभावों में रहकर न्याय का सपना देखा था।
*1. सरनेम की सादगी: क्यों नहीं लगाते ‘शर्मा’?*
जस्टिस सूर्यकांत का पूरा नाम सूर्यकांत शर्मा है। वे एक ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखते हैं, लेकिन उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता उनकी जातिगत पहचान से दूरी है।
* विस्फोटक तथ्य: उनके पिता (एक संस्कृत शिक्षक) और उनके परदादा का मानना था कि न्याय की कुर्सी पर बैठने वाले व्यक्ति की पहचान केवल ‘न्याय’ होनी चाहिए, जाति नहीं। यही कारण है कि उन्होंने अपने नाम के साथ ‘शर्मा’ को कभी सार्वजनिक पहचान नहीं बनाया। उनके गांव में आज भी लोग उन्हें ‘सादगी का प्रतीक’ मानते हैं, जो सीजेआई बनने के बाद भी खेतों में पगडंडियों पर चलने से गुरेज नहीं करते।
*2. यूजीसी (UGC) और शिक्षा जगत में ‘सर्जिकल स्ट्राइक’*
जस्टिस सूर्यकांत के कई फैसलों ने देश की शिक्षा व्यवस्था की चूलें हिला दीं।
* यूजीसी बनाम राज्य: उन्होंने एक ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया कि UGC की गाइडलाइंस केवल सलाह नहीं, बल्कि कानून हैं। उन्होंने साफ कहा कि यदि कोई यूनिवर्सिटी यूजीसी के मानकों का पालन नहीं करती, तो उसकी डिग्री ‘कागज के टुकड़े’ से ज्यादा कुछ नहीं है।
* फर्जी डिग्रियां: उन्होंने तकनीकी शिक्षा में ‘डिस्टेंस लर्निंग’ (पत्राचार) के जरिए दी जाने वाली फर्जी इंजीनियरिंग डिग्रियों पर कड़ा प्रहार किया और हजारों अवैध डिग्रियों को रद्द करने के फैसले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
*3. वो फैसले जिन्होंने सत्ता के गलियारों में मचाया हड़कंप*
जस्टिस सूर्यकांत अपनी ‘कठोर टिप्पणियों’ और ‘साहसिक फैसलों’ के लिए जाने जाते हैं:
* नूपुर शर्मा केस (The Sharp Rebuke): सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान उनकी पीठ ने जो टिप्पणी की, उसने पूरे देश में बहस छेड़ दी थी। उन्होंने सत्ता की हनक और टीवी डिबेट्स के जरिए फैलने वाली नफरत पर कड़ा प्रहार किया था।
* किसानों के मसीहा: लखीमपुर खीरी मामले में जब न्याय की उम्मीद धुंधली पड़ रही थी, तब जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने कड़ा रुख अपनाते हुए निष्पक्ष जांच सुनिश्चित की। उन्होंने स्पष्ट किया कि “कानून का हाथ किसी की भी गर्दन तक पहुँचने के लिए काफी लंबा है।”
* प्रदूषण पर ‘सुप्रीम’ डंडा: दिल्ली-NCR में पराली और प्रदूषण के मुद्दे पर उन्होंने सरकारों को फटकार लगाते हुए कहा था कि “हवा में जहर है और हम फाइलों में खेल रहे हैं।” उनके आदेशों के बाद ही ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (GRAP) को सख्ती से लागू किया गया।
*4. हरियाणा के ‘लाल’ का डिजिटल विजन*
भारत के 53वें सीजेआई के रूप में जस्टिस सूर्यकांत का लक्ष्य ‘न्याय का सरलीकरण’ है।
* वे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के जरिए क्षेत्रीय भाषाओं (जैसे हिंदी, हरियाणवी आदि) में फैसलों के अनुवाद के सबसे बड़े पैरोकार हैं।
* उनका मानना है कि एक किसान को अपना फैसला समझने के लिए वकील की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए।
*5. व्यक्तिगत जीवन: शिक्षक का बेटा, न्याय का देवता*
* जन्म: 10 फरवरी 1962
* सादगी: आज भी गांव जाने पर वे सुरक्षा तामझाम किनारे रखकर अपने पुराने यार-दोस्तों के साथ चौपाल पर बैठ जाते हैं।
* रिटायरमेंट: 9 फरवरी 2027
*निष्कर्ष:* जस्टिस सूर्यकांत शर्मा का कार्यकाल भारतीय न्यायपालिका के लिए ‘स्वर्ण युग’ माना जा रहा है। वे एक ऐसे जज हैं जो कानून की किताब के साथ-साथ समाज की नब्ज भी समझते हैं। उनके फैसले यह साबित करते हैं कि न्याय केवल महलों की जागीर नहीं, बल्कि गांव की पगडंडी से आया व्यक्ति भी उसे मुकम्मल कर सकता है।