लखनऊ में यातायात निरीक्षक के इशारे पर वाहन स्वामियों से जबरदस्त धन उगाही
तीन सौ रुपए की दर से प्रत्येक बसों से की जा रही जबरन वसूली, उच्चाधिकारियों के इशारे पर हो रही वसूली

*एक्सक्लूसिव: लखनऊ में ट्रैफिक ‘टेरर’ – मटियारी ब्रिज और इंदिरा नहर पर अवैध वसूली*
*प्राइवेट बसों से ₹300 तक की ‘रिश्वत’ लेने का सनसनीखेज खुलासा*
*अधिकारियों पर दो माह से मौन साधने का आरोप*
लखनऊ। राजधानी लखनऊ में यातायात व्यवस्था बहाल करने के लिए तैनात ट्रैफिक पुलिस (Traffic Police) पर ही अब अवैध वसूली और उत्पीड़न के गंभीर आरोप लगे हैं। इंद्रा नहर से लेकर मटियारी ब्रिज तक के क्षेत्रों में ड्यूटी कर रहे टीएसआई (TSI) और हवलदारों पर प्राइवेट बसों को सिटी में प्रवेश देने के नाम पर प्रतिदिन ₹200 से ₹300 की रिश्वत लेने का आरोप है। बस चालकों ने इसे ‘रिश्वतखोरी की चरम सीमा’ बताते हुए तत्काल उच्च स्तरीय जांच और सख्त कार्रवाई की मांग की है।
*नो-एंट्री’ के नाम पर खुली लूट*
बस चालकों द्वारा लगाए गए आरोपों के अनुसार, यह अवैध वसूली का खेल पिछले लगभग दो माह से अधिक समय से चल रहा है। ट्रैफिक पुलिसकर्मी, जो अक्सर सरकारी बोलेरो या टाटा सूमो जैसी गाड़ियों में गश्त करते हैं, सिटी में प्रवेश करने वाली प्राइवेट बसों को निशाना बनाते हैं।
* वसूली का तरीका: बस को रोककर पहले डीसीपी यातायात का आदेश बताकर वापस जाने को कहा जाता है। रिश्वत देने के इच्छुक चालक को हेलमेट के नीचे या पास की किसी गुमटी पर इशारा करके पैसे जमा करने का संकेत दिया जाता है।
* दैनिक ‘चढ़ावा’: चालकों का कहना है कि हर दिन ₹200 से ₹300 का ‘चढ़ावा’ देने पर ही बस को सिटी में प्रवेश मिलता है।
* धमकी और उत्पीड़न: आरोप है कि यदि कोई चालक सवाल करता है या पैसा देने से इनकार करता है, तो टीएसआई दिनेश पांडे जैसे अधिकारी बस को तत्काल सीज करने की धमकी देते हैं, जिससे बस मालिक भारी नुकसान के डर से चुपचाप पैसा दे देते हैं।
*उच्च अधिकारियों के नाम का इस्तेमाल*
शिकायत में कहा गया है कि जब बस चालक यातायात पुलिसकर्मियों से प्रवेश रोकने का आदेश पूछते हैं, तो वे टी.आई. वेंकटेश्वर सिंह से बात करने को कहते हैं। टीआई कथित तौर पर डीसीपी यातायात का नाम लेते हुए यह कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि ‘यह उन्हीं का आदेश है और हमें अपनी नौकरी बचानी है।’ अब तो कथित तौर पर पुलिसकर्मी अपर आयुक्त यातायात का नाम लेकर भी वसूली कर रहे हैं, जिससे पूरे मामले में वरिष्ठ स्तर पर संलिप्तता या लापरवाही का संदेह पैदा होता है।
*फोटो खींचकर चालान का डर*
यह वसूली सिर्फ नकद तक सीमित नहीं है। आरोप है कि ट्रैफिक पुलिस की गाड़ियां बसों को रोककर उनकी फोटो खींचती हैं और तुरंत पैसे की मांग करती हैं। यदि भुगतान नहीं किया जाता है, तो बस मालिक को तत्काल चालान का मैसेज भेज दिया जाता है।
इसके अलावा, क्षेत्र में तेज गति से चलने वाले बाइक रेसरों को भी रोका जाता है और ₹1000 की मांग की जाती है, यह कहकर कि यह उनका ‘एरिया’ है।
*तत्काल उच्च स्तरीय जांच की मांग*
इस सनसनीखेज खुलासे के बाद, जनता और बस मालिकों ने सवाल उठाया है कि क्या इन ट्रैफिक पुलिसकर्मियों को केवल अवैध वसूली के लिए ही तैनात किया गया है?
शिकायतकर्ता ने मांग की है कि:
* तत्काल प्रभाव से उच्च स्तरीय जांच कराई जाए।
* रिश्वतखोरी में लिप्त टीआई, टीएसआई और सिपाहियों के विरुद्ध कानूनी सजा (निलंबन और बर्खास्तगी) की कार्रवाई की जाए।
* इनके स्थान पर ईमानदार अधिकारियों को ड्यूटी पर लगाया जाए ताकि जनता का ट्रैफिक पुलिस पर भरोसा बना रहे और सुगम यातायात बहाल हो सके।
दो माह से चल रही इस कथित वसूली पर उच्च अधिकारियों के मौन ने मामले की गंभीरता को और बढ़ा दिया है। अब देखना यह है कि लखनऊ प्रशासन इस गंभीर आरोप पर क्या संज्ञान लेता है।

