ईवीएम पर अविश्वसनीय खुलासा: भारत सरकार सहित चुनाव आयोग संदेह के घेरे में, आखिर अमेरिका जैसे देश में ईवीएम से चुनाव क्यों नहीं होते
क्या भारत में ईवीएम को बैन करना होगा, गंम्भीर आरोपों में फसा चुनाव आयोग, भारत सरकार पर भी लग रहा है वोटों की डकैती का आरोप
*खुलासा:तकनीक के शिखर पर होने के बावजूद अमेरिका ईवीएम से क्यों करता है परहेज़?*
*भारत में क्यों उठ रहे हैं बार-बार बैलेट पेपर के पक्ष में स्वर?*
*शिवराम/ कृष्णानन्द शर्मा*
दिल्ली। भारत में चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर एक बार फिर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने ईवीएम के खिलाफ देशव्यापी अभियान चलाने का ऐलान किया है। इस बहस को तब और बल मिला जब दुनिया के सबसे बड़े टेक टायकून एलन मस्क ने भी EVM को हैक किए जाने की आशंका जताकर इसे संदेह के घेरे में ला दिया।
इस पृष्ठभूमि में, यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति और तकनीक में सबसे उन्नत देश संयुक्त राज्य अमेरिका भी अपने राष्ट्रपति चुनावों से लेकर स्थानीय चुनावों तक में ईवीएम का व्यापक उपयोग क्यों नहीं करता और आज भी पारंपरिक कागजी बैलट (Paper Ballot) प्रणाली पर ही क्यों भरोसा करता है।
*तकनीक में अग्रणी अमेरिका ईवीएम से क्यों है दूर?*
अमेरिका में ईवीएम को बड़े पैमाने पर न अपनाने के पीछे मुख्य रूप से जनता का भरोसा (Public Trust) और सुरक्षा जोखिम प्रमुख कारण हैं:
* साइबर सुरक्षा की चिंताएँ: अमेरिकी विशेषज्ञ और नागरिक मानते हैं कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों को हैकिंग और साइबर हमलों से पूरी तरह सुरक्षित रखना लगभग असंभव है। अतीत में भी EVM में तकनीकी खामियों की रिपोर्ट्स सामने आई हैं।
* सत्यापन की कमी (Lack of Audit Trail): अमेरिका में कागजी बैलट को इसलिए अधिक विश्वसनीय माना जाता है क्योंकि यह मतों की मैन्युअल पुनर्गणना और सत्यापन की सुविधा देता है। EVM में यह प्रमाणित करने का कोई स्पष्ट तरीका नहीं होता कि वोट सही ढंग से दर्ज हुआ है या नहीं।
* पारदर्शिता और विश्वसनीयता: अमेरिकी नागरिक इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम की तुलना में कागजी बैलट को अधिक भरोसेमंद मानते हैं, जिससे चुनाव प्रक्रिया में जनता का भरोसा बना रहता है।
*भारत में ईवीएम को लेकर ‘राजनीतिक षड्यंत्र’ और ‘हैकिंग’ का दावा*
लेख में भारत की राजनीतिक पार्टियों और EVM की तकनीकी विश्वसनीयता को लेकर गंभीर और विवादास्पद दावे किए गए हैं:
1. OBC/SC/ST पार्टियों को खत्म करने का आरोप:
लेख में दावा किया गया है कि EVM को 1988 में OBC/SC/ST की पार्टियों जैसे BSP (कांशीराम) के उभार को रोकने के लिए ‘वोटों की मॉडर्न लूट’ के रूप में लाया गया।
* पार्टी समाप्ति का षड्यंत्र: आरोप है कि एक गुप्त समझौते के तहत, बसपा (मायावती) और सपा/राजद (मुलायम/लालू) जैसे दलों को धन और जांच एजेंसियों के दुरुपयोग से कमजोर करके, EVM के माध्यम से 2027 तक पूरी तरह खत्म करने की योजना है।
* विकल्प निर्माण: दावा है कि OBC/SC/ST की पार्टियों को हटाकर, केजरीवाल (आप) को ‘नई कांग्रेस’ के रूप में खड़ा कर दिया जाएगा, जिससे देश में ‘ब्राह्मण और साम्राज्यवादी चंद अल्पसंख्यकों’ का राज स्थापित हो जाए और OBC/SC/ST का आरक्षण समाप्त कर दिया जाए।
* गुलामी से मुक्ति का आह्वान: राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग मोर्चा के सुनील अहीर ने ब्राह्मण की गुलामी से आजाद होने के लिए फूले-अंबेडकर के विचारों को अपनाने और वामन मेश्राम के नेतृत्व में संगठित होने का आह्वान किया है।
2. EVM के ‘स्टैण्ड अलोन’ होने पर तकनीकी संदेह
लेख में EVM के ‘हैकिंग’ की संभावना को सिद्ध करने के लिए एक महत्वपूर्ण तकनीकी सवाल उठाया गया है:
* स्टैण्ड अलोन का खंडन: तर्क दिया गया है कि EVM ‘स्टैण्ड अलोन मशीन’ नहीं हो सकती। चुनाव से कुछ दिन पहले, एक इंजीनियर एक विशेष पेन ड्राइव (डेटा केबल युक्त) का उपयोग करके अंतिम प्रत्याशियों के नाम और चिन्ह का एनक्रिप्टेड डेटा सभी EVM में अपलोड करता है।
* चोरी का ‘कमांड’: यह दावा है कि इस एन्क्रिप्टेड फाइल में वोट चोरी का एक गुप्त प्रोग्राम (कमांड) जोड़ा जा सकता है। यह प्रोग्राम EVM की रियल टाइम क्लॉक का उपयोग करके, मॉक पोल में नहीं, बल्कि केवल वोटिंग के दिन निर्धारित समय (जैसे सुबह 10 बजे से शाम 4 बजे तक) के दौरान ही वोटों की चोरी करेगा, जिससे इसे पकड़ना मुश्किल हो जाए।
इस विशेष विश्लेषण से स्पष्ट है कि जहाँ अमेरिका सुरक्षा कारणों से ईवीएम से दूरी बनाए रखता है, वहीं भारत में यह मशीन न केवल तकनीकी बल्कि गहरे राजनीतिक और सामाजिक षड्यंत्रों के आरोपों के केंद्र में भी आ गई है, जिससे ‘बैलेट पेपर’ की मांग ज़ोर पकड़ रही है।


